अब अगर मिलो तो अजनबी बनकर मिलना,
पुराने ज़ख्मों को पहचान की ज़रूरत नहीं होती।
वक़्त ने बहुत कुछ बदल दिया दरमियाँ,
चलो माना मैं बदल गया, तुम वैसे ही हो क्या।
जवाब ना आना भी शायद एक जवाब ही था,
हमने खामोशी पढ़ ली, बस यक़ीन देर से हुआ।
वो इतना करीब आया कि धड़कन बन गया,
फिर यूँ दूर गया जैसे कभी मिला ही न था।
जिसे खोने का डर सबसे ज़्यादा था,
आख़िर वही सबसे पहले खो गया।
कुछ लोग किताब की तरह होते हैं,
पढ़ तो लिए जाते हैं, समझ कभी नहीं आते।
तुम्हें भूलने की कोशिश रोज़ करता हूँ,
और रोज़ तुम्हारी याद जीत जाती है।
एक चाहत है कि कोई मुझे भी यूँ चाहे,
जैसे मैं उसकी हर ख़ुशी में ख़ुद को ढूँढता हूँ।
तुम्हारी कमी का इलाज कहीं मिला नहीं,
लोग दवा देते रहे, दर्द बढ़ता गया।
कुछ रिश्ते मुकम्मल होने के लिए नहीं बनते,
वो सिर्फ़ हमें मोहब्बत का मतलब सिखाने आते हैं।
तुम्हारी यादों का मौसम अब भी नहीं बदला,
बस मैं मुस्कुराना सीख गया हूँ दर्द छुपाने के लिए।
कभी सोचा था तुम्हारे साथ उम्र गुज़रेगी,
अब तुम्हारा ज़िक्र भी उम्र भर का किस्सा बन गया।
मैंने हर मोड़ पर तुम्हें ही पुकारा था,
अब जो ख़ामोश हूँ, तुम्हें फ़र्क़ पड़ा क्या।
By Ajay Gautam
