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“तुम बोलोगे हाथी उड़, मैं तब भी हाथ उठा दूंगा”

“तुम बोलोगे हाथी उड़, मैं तब भी हाथ उठा दूंगा”

“Tum bologe haathi udd, Main tab bhi haath utha doonga.”

यह हिंदी का एक लोकप्रिय मुहावरा या काव्यात्मक वाक्यांश है, जो अटूट भक्ति, निष्ठा या वफादारी को दर्शाता है।

“तुम बोलोगे हाथी उड़, मैं तब भी हाथ उठा दूंगा”
— यह पंक्ति केवल प्रेम नहीं, पूर्ण समर्पण और अटूट विश्वास की घोषणा है।

इसमें प्रेम का वह स्तर छुपा है जहाँ तर्क थक जाता है, अहंकार मिट जाता है और सिर्फ एक ही भावना शेष रहती है —
“तुम जैसा देखो, मैं वैसा ही देखूँ।”

यह पंक्ति बताती है कि रिश्ता अब सहमति पर नहीं,
श्रद्धा पर टिका है।
जहाँ सामने वाला सच बोले या असंभव —
विश्वास की आँखें फिर भी हाथ उठा देती हैं।

यह प्रेम नहीं,
आत्म-समर्पण की चरम अवस्था है।

“तुम बोलोगे हाथी उड़, मैं तब भी हाथ उठा दूंगा”

तुम कहो तो अँधियारा भी सूरज सा चमके,
तुम कहो तो पत्थर में धड़कन भर दूँगा।

जहाँ तुम रुको, वहीं मेरी दुनिया ठहर जाए,
मैं हर हार में भी तुम्हें जीत समझ लूँगा।

तुम्हारे सच की मुझे ज़रूरत नहीं,
तुम्हारा होना ही मेरी दलील है।

जो आँखों से दिखे, वो सब बाद में,
पहले तो मैं तुम्हारे ख्वाबों में जी लूँगा।

कह देना बस एक बार, चाहे असंभव ही सही,
मैं असंभव को भी इबादत बना लूँगा।

तर्क की हर किताब आज अलमारी में रख दी है,
तुम्हारे एक झूठ को भी सच बना दूँगा।

कहते हैं अंधा होता है इश्क़, तो होने दो,
तुम जिस तरफ़ इशारा कर दो, मैं वही देख लूँगा।

मुझे सच की नहीं, बस तुम्हारी ज़रूरत है,
तुम जो कह दो, उसी में अपनी दुनिया बसा लूँगा।

इश्क़ की इंतिहा पूछो तो बस इतना समझो,
“तुम बोलोगे हाथी उड़, मैं तब भी हाथ उठा दूंगा”