हमने उनके घर देखे,
घर के भीतर तलघर देखे।
ऊँची-ऊँची दीवारों पर,
झूठे कितने स्वर देखे।
सजदे करते हाथ बहुत थे,
दिल के भीतर ख़ंजर देखे।
रिश्तों की रंगीन किताबों में,
खाली कितने सफ़र देखे।
चेहरों पर मुस्कानें थीं,
दिल में लेकिन ज़हर देखे।
महफ़िल में जो साथ खड़े थे,
रास्तों में वही इधर-उधर देखे।
सच की बातें करने वालों के,
लब पर कितने पहर देखे।
दौलत के ऊँचे महलों में,
तन्हाई के बिस्तर देखे।
अपनों की भीड़ मिली लेकिन,
अपने कितने कमतर देखे।
वक़्त ने जब आईना दिखलाया,
सबके बदले हुए स्वर देखे।
By Ajay Gautam
