दूसरा नेहरू कहाँ से लाऊँ?
वो सोच, वो नज़र, वो करिश्मा कहाँ से लाऊँ,
इतिहास पूछता है — दूसरा नेहरू कहाँ से लाऊँ?
जो ख़्वाब बुन सके मुल्क के हर इक इंसान के लिए,
वो दिल, वो जज़्बा, वो नज़रिया कहाँ से लाऊँ?
इल्म की रोशनी से जो ज़माना जगमगाया था,
वो शख़्स, वो उजाला, वो सवेरा कहाँ से लाऊँ?
जिसने कलम से किस्मत बदलने की ठानी थी,
वो हौसला, वो जुर्रत, वो साया कहाँ से लाऊँ?
तारीख़ के सफ़ों में जो अब बस कहानी है,
वो दौर, वो फ़साना, वो चेहरा कहाँ से लाऊँ?
जो ख्वाबों को हकीकत में बदलने का हुनर रखता,
वो फ़िक्र, वो तसव्वुर, वो रस्ता कहाँ से लाऊँ?
जिसने हर दिल में उम्मीद की लौ जलाई थी,
वो नूर, वो चिराग़, वो दिया कहाँ से लाऊँ?
सियासत में भी जिसने इंसानियत को जिंदा रखा,
वो उसूल, वो सलीका, वो रिश्ता कहाँ से लाऊँ?
जो वक्त के थपेड़ों में भी अडिग सा खड़ा रहा,
वो सब्र, वो यकीन, वो दरिया कहाँ से लाऊँ?
हर ज़ुबाँ पे आज भी जिसका नाम मुकम्मल है,
वो असर, वो शख्सियत, वो नेता कहाँ से लाऊँ?
