अगर मोहब्बत पूरी नहीं होती,
तो क्या वो मोहब्बत नहीं होती?
हर कहानी का अंजाम मिलन हो,
ज़रूरी तो ये किस्मत नहीं होती।
जो साथ होकर भी अपने न हों,
उनसे भी दिल की शिकायत नहीं होती।
कभी फ़ासले भी रिश्तों की हिफ़ाज़त करते हैं,
हर नज़दीकी में चाहत नहीं होती।
जिसे पाने की चाह में उम्र गुज़र जाए,
वो चाह यूँ ही इबादत नहीं होती।
कुछ नाम दुआओं में बस जाते हैं,
हर दुआ की मंज़िल जन्नत नहीं होती।
जो बिना शर्त दिल से निभाई जाए,
उसकी कोई हार या जीत नहीं होती।
इश्क़ सौदों का बाज़ार नहीं,
जहाँ हर भावना की क़ीमत नहीं होती।
कई अधूरे ख़्वाब ही जीने की वजह बन जाते हैं,
कई लोग मंज़िल बनकर बिछड़ जाते हैं।
कुछ लोग मुक़द्दर में नहीं,
मगर रूह की किताब में हमेशा के लिए लिखे जाते हैं।
शायद सबसे सच्ची मोहब्बत वही होती है,
जो मुकम्मल होकर भी ख़त्म नहीं होती।
जो बिछड़कर भी दिल की धड़कनों में बसती रहे,
जिसकी याद कभी पुरानी नहीं होती।
फिर पूछता हूँ ख़ुद से वही सवाल—
अगर मोहब्बत पूरी नहीं होती,
तो क्या वो मोहब्बत नहीं होती?
शायद मोहब्बत की पहचान मिलन से नहीं,
बल्कि उस एहसास से होती है
जो उम्र भर साथ रहे,
चाहे कहानी पूरी हो या नहीं होती।
By Ajay Gautam
