जब चुना ही क़त्ल का हुनर देखकर,
तो सहना भी सीखो ये कहर देखकर।
तुम्हीं ने सिखाया था हमें ये रास्ता,
अब डरते क्यों हो अंजाम-ए-सफ़र देखकर।
ख़ून से लिखी गई थी जो दास्ताँ कभी,
क्यों काँपते हो अब वही असर देखकर।
तुम्हारी ही बनाई हुई ये वीरानियाँ हैं,
क्यों रोते हो अब अपना ही घर देखकर।
जिस आग को खुद ही हवा देते रहे,
अब बुझते क्यों हो उसी का डर देखकर।
तुमने ही बोए थे नफ़रत के ये बीज,
अब हैरान क्यों हो ये ज़हर देखकर।
जो खेला था तुमने इंसानों की ज़िंदगी से,
अब चुप क्यों हो उनका ये बिखर देखकर।
आईना दिखाता है बस सच का चेहरा,
क्यों टूटते हो खुद का ही असर देखकर।
तुम्हारी ख़ामोशी भी गवाही देती है,
क्यों बचते हो अपने ही हुनर देखकर।
